कोरोना और लॉकडाउन
Poem

कोरोना और लॉकडाउन

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की थी कल्पना जिस दिन की मैंने,

आज वो मेरे सामने है

थोड़ा धुंधला ही सही,

पर आज कामयाबी मेरे हाथ में है

 

हित मे है सब, अब घर मे हैं सब,

सामने ही नहीं, पर अब सबके दिल मे हैं सब

ख़ुशी है अब, जब मिल गए हम सब,

दुःख है की कभी पास होकर भी, पहले दूर थे हम सब

 

वक्त से तेज़ और खुद से दूर थे, हम सब मजबूर,

दौड़ने लगे थे सच्चाई से, और अब डरते है अनजान की परछाई से,

हाथ न मिला, नमस्ते से बात बढ़ी,

साफ़ रह कर भी जान गले पर आ पड़ी,

पता चली अब खुद की कीमत,

जब घर बैठे देश की रक्षा करी।

 

निकले न घर से बाहर, जंग कोरोना से थी,

हल्की नहीं बड़ी संगीन थी, रंगीन थी हर शाम,

जो थी सबकी चाय के नाम,

जो बालकनी मे कटी थी पड़ोसियों के नाम

 

ऐसी हालत मे हमारा राजा न हारा,

हो इकठ्ठा शाम को, करा ऐसा तमाशा,

बहरा सा करा महामारी को,

अन्धकार मे भटका दिया,

जलाया दीपक ऐसा जैसे,

श्री राम को धरती मे बुला लिया

 

अजीब थी वो शामे, पर मज़ा भरपूर लिया,

दिया जिसने हमे यह मौका,

हमने उसे कोरोना का नाम दिया

जोड़ लिया बिस्तर से रिश्ता,

कि उठने का नाम न लिया,

तोड़ दिया काम से रिश्ता

कि लॉकडाउन में उसका नाम न लिया

 

हवा शुद्ध, पशुपक्षियां निर्भय हो गए,

लेकिन हर जन भयभीत हो गए,

शुद्ध थी हवा फिर भी मुँह पर कपडा था,

क्या करे साहब महामारी ने हमको इस तरह ऐसा जकड़ा था।

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