श्यामली
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श्यामली

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श्यामली … माँ-बाबा ने जब ये नाम मेरे लिए चुना होगा, तब ये नहीं सोचा होगा की इस तरह से ये नाम मेरा जीवन बन जायेगा |

आज भी जब वो दिन याद आता है, तो मन दहल जाता है | मैं उस समय १४ बरस की होंगी | रात का समय था, बाबा की तबियत बिगड़ रही थी | माँ ने मुझे जगाया वो बहुत घबराई हुई थी | माँ बोली, जा शामू पास वाले काका को बुला ला | मैं दौड़ कर गयी और काका का दरवाजा खटखटाया , काकी ने बताया काका घर पर नहीं है | मैं समझ नहीं पा रही थी क्या करू, बाबा की तबियत बिगड़ती जा रही थी | माँ के मना करने पर भी मैं बड़ी हिम्मत करके अस्पताल की और भाग पड़ी | वहाँ पहुंच कर डॉक्टर को अपने बाबा का हाल बताया तो डॉक्टर ने रात को चलने पर दोगुनी फीस माँग ली |

मेरे पास पैसे नहीं थे, मैंने बहुत मिन्नतें की पर डॉक्टर ने साथ आने से मना कर दिया | मैं दुखी मन से घर की ओर चल दी | कुछ ही दूर चली थी की एक आहट सी सुनाइ दी, मैंने मुड़कर देखा – कोई नहीं था | मन ही मन मैं डर गयी थी, मैंने जल्दी जल्दी चलना शुरू कर दिया | थोड़ा ही चली थी किसी ने मेरे ऊपर कम्बल डाला ओर मेरा मुँह दबा दिया | ये कौन है, मुझे कहाँ ले जा रहे है, मैं समझ नहीं पा रही थी | मैंने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की पर कुछ न कर सकी |  वो मुझे सुनी जगह ले गए मेरे मुँह पर पट्टी बांध दी हाथ पैर बांध कर मुझे किसी अँधेरे कमरे में बंद कर दिया | मैं खुद को छुड़ाने की कोशिश करती रही पर कुछ न कर सकी | थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला, कोई अंदर आया-अँधेरे में सही से देख पाना मुश्किल हो रहा था | उसने मेरे पास आकर बोला डॉक्टर ने तुम्हारे बाबा को देख लिया है, वो ठीक है | मैं कुछ भी नहीं समझ पा रही थी वो कौन है ,क्या चाहता है, मैं कहाँ हूँ |

वो बोला अभी मैडम आएगी तुमको उनके साथ जाना है बस | कुछ ही देर में एक गाड़ी की आवाज आयी, साड़ी पहनी एक औरत मेरे पास आकर खड़ी हो गयी | “मैडम सब रेडी है आप इसको ले जा सकती है ” मेरे पास बैठा वो आदमी बोला | मुझे जबरन गाडी में बैठा दिया गया | मुझे कहा ले जाया गया मुझे कुछ पता नहीं चला | मुझे ले जाकर कमरे में बंद कर दिया मेरे हाथ मुँह खोल दिए | मैं बहुत छटपटाई पर कुछ न कर सकी बैठ कर रोने लगी | रोते रोते सुबह हो गयी, बाहर से आवाज आयी कमरे में पानी ओर खाना रखा है खा लेना | सारा दिन रोते रोते यही सोचने में निकल गया ये सब क्या हो गया मैं कहाँ हूँ ओर क्यों हूँ, ये लोग कौन है, बाबा कैसे होंगे| अचानक  दरवाजा खुला तो ध्यान टुटा, कोई अंदर आया। मैं कुछ सोच पाती, कुछ कह पाती इससे पहले उसने देखते ही देखते मेरी इज्जत को तार-तार कर दिया । मैं रोती रही, चिल्लाती रही पर वहाँ मेरी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था ।

उस दिन ये श्यामली मैली हो कर सिर्फ श्याम रह गयी । ये श्याम रंग मेरी जिंदगी बन गया | जब भी वो श्यामली याद आती है थोड़ा रो लेती हूँ  और कर भी क्या सकती हूँ |

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