मेरा साकी मेरी हाला - भाग 1
Poem

मेरा साकी मेरी हाला – भाग 1

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मेरा साकी मेरा हाला

1

ग्राम नगर का कहो मुझको,

मैं जग का रहने वाला।

भिन्न भिन्न मेरे वेशो ने,

जन जन को भ्रम में डाला।

नूतन यात्रा मित्र पुराने,

सृष्टि नियम मैने पाला।

निद्रा जागृति जागृति निद्रा,

बनी रही मेरी माला।

2

मेरा मैं मेरी मधुशाला,

मेरा साकी मेरी हाला।

जिस हाला का मेरा प्याला,

उसका हूँ मैं मतवाला।

तुम्हे कसम तुम किसी को मानो,

मुझे ना छेड़ो पर लाला।

इस मधुशाला में ऐसा ही,

मैंने निज जीवन ढाला।

3

हर मंज़िल पर आता रहता,

मुझसे लेन देन वाला।

बस ऐसे ही लेन देन ने,

मम जीवन अभिनव ढाला।

कहीं प्रेम की मिलती हाला,

कहीं घृणा का भी प्याला।

मस्ती से पीता चलता हूँ,

दे अपने मुँह पर ताला।

4

कर्मठता सौजन्य साधुता,

मानवता का हर प्याला।

प्रेम धातु का बना हुआ है,

पृथक पृथक केवल ढाला।

स्वाद एक होता है इनका,

अरु समान होती हाला।

निर्भय होकर मस्त झूमता,

बिरला है पीने वाला। 

5

खूब ज्ञात साकी को तेरा,

तन मन धन सब है काला।

यहाँ तेरा अन्य हितैषी,

जो राह बता दे मधुशाला।

प्रेम त्याग और सत्य अहिंसा,

समता की नज़रों वाला।

पीता है दिन रैन सदा वह,

मधु का प्याले पर प्याला। 

6

जिसके तन के रोम रोम में,

रमी हुई है वह हाला।

दिव्य दृष्टि से देख रहा है,

कण कण में साकी बाला।

रामकृष्ण के कर कमलों से,

पीकर वह मदिरा प्याला।

बना विवेकानंद विश्व की,

चलती फिरती मधुशाला।

7

जब तक रहा मांगता हाला,

साकी ने मुझको टाला।

मिट्टी का है नही खिलौना,

उसकी मदिरा का प्याला।

तेरा मेरा भेद हटाकर,

यत्नों से इसको ढाला।

खड्ग धार पर चलना पड़ता,

तब मिलती है मधुशाला। 

8

पलको की झाड़ू से वर्षो,

साफ करे दर मधुशाला।

द्वारपाल की कड़ी यातना,

हो हर्षित सहने वाला।

मान प्रतिष्ठा छोड़ जगत की,

मूल्य चुका दे जब हाला।

तब प्रवेश पाता है अंदर,

अलबेला पीने वाला। 

9

मधु का प्याला अजब निराला,

चमत्कार करने वाला।

इसको पीने वाला मन का,

कैसा भी होवे काला।

धुल जाता है सारा काला,

रह जाता बस उजियाला।

यह उजियाला हाला प्याला,

यह उजियाला मधुशाला।

Please read Part 2, Part 3, Part 4, Part 5 and Part 6 of मेरा साकी मेरा हाला

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