मेरा साकी मेरी हाला – भाग 5
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मेरा साकी मेरी हाला – भाग 5

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मैं लालिमा कपोलों की हूँ,

हूँ मैं नयनो की हाला |

अधरों की मधुमयता हूँ मैं,

केश श्याम हूँ घुंघराला |

मुखमण्डल का रूप मनोरम,

मेरी छवि लेकर ढाला,

मौन, विकल, विरहिन बन रोती,

वह मैं ही साकी बाला |

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मैं हूँ प्रेम, प्रेमिका भी मैं,

मैं ही पिया परदे वाला |

मैं ही पीड़ा, पीड़ित भी मैं,

औ पीड़ित करने वाला |

बना गाँठ खुद की मैं अपनी,

खुद से ही खुलने वाला,

भेद नहीं खुलता पर फिर भी,

बड़ी समस्या में डाला |

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चारो और घेरता मुझको,

क्यों दरिद्रता का जाला |

ह्रास हुआ शक्ति का कैसा,

किसने बंदी कर डाला |

परवश शीश पटकता हूँ मैं,

ज्यूँ मणि बिन विषधर काला |

कहाँ गया हाला का प्याला,

कहाँ गई साकी बाला |

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विघ्न अनेको का पथ में बन,

पड़ा हुआ अजगर काला |

विकल हृदय में अग्नि धधकती,

रूठ रही साकी बाला |

पी लेता हूँ उठा सुराही,

भर भर मदिरा का प्याला |

छोड़ गए सब मुझे तड़पता,

साथ दे रही मधुशाला |

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हाट छोड़कर मीर कारवां,

चला लिए मन का छाला |

विदा दे रहे हैं व्यापारी,

दाल रहे गजरे माला |

टूट गया दल बल से नाता,

चला अकेला ही लाला |

चारो और मचा हंगामा,

रुक ना सका जाने वाला |

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बड़ा कुतूहल हुआ हृदय में,

विधि ने खेल रचा आला |

भार सहा आजीवन जिनका,

गोदी में जिनको पाला |

यद्यपि निकट शमशान भूमि है,

तुरत कफ़न सिर पर डाला |

बदल बदल कन्धा ले जाते,

भार बना मरने वाला |

Please read Part 1, Part 2, Part 3, Part 4 and Part 6 of मेरा साकी मेरा हाला

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