मेरा साकी मेरी हाला 4
Poem

मेरा साकी मेरी हाला – भाग 4

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इस जीवन की सच्चाई को,

सब विधि समझा देखा भाला |

करो स्वंय की खोज निरंतर,

मत बैठो जग में ठाला |

आंख मिचौनी खेल रहा है,

वह बाहर भीतर वाला |

बाधा, विघ्न लुप्त होते है,

जब हो गुरु अंकुश वाला |

27

मैं हूँ रंग सुरभि सुमनो का,

उपवन है ही हरियाला |

मैं रजनी का घोर तिमिर हूँ,

और प्रात: का उजियाला |

ऋतू बसंत की पवन सुगन्धित,

चंद्र प्रभा हूँ दूधियाला |

कोमल मधुर मृदुल हूँ मैं तो,

अनुपम  आकृति छवि वाला |

28

सुगति मनोहर निर्झर की हूँ,

मैं पर्वत अविचल वाला |

मैं समुन्द्र की चपल बीचि हूँ,

भंवर भयंकर छल वाला |

सरिता का तट मन मोहक मैं,

शीतल जल कल कल वाला |

दृश्य सरोवर का मन भावन,

निर्मल नीर कमल वाला |

29

झाड़ी तीक्ष्ण शूल की हूँ मैं,

वृक्ष रसीले फल वाला |

हरा भरा उद्यान खेत हूँ,

मैं सुखकर मंगल वाला |

लतिका कुँज वाटिका हूँ मैं,

ऐंठन, सिकुड़न, बल वाला |

ध्रुव प्रदेश की कड़क शीत हूँ,

मैं मरुस्थल निर्जल वाला |

30

ज्ञान, कर्म, इन्द्रियां हूँ मैं,

अंतरतल निर्मल वाला |

शील, शक्ति, सौंदर्य समन्वित,

दृढ संकल्प अटलवाला |

कविता, ललित कला पावन हूँ,

मैं गायन स्वर लय वाला,

जप, तप, योग, यज्ञ, आहुति मैं,

वैदिक मंत्र अभय वाला |

31

साधन, वंदन, अर्चन हूँ मैं,

प्रातिभ शक्ति रमण वाला |

नाड़ी अष्ट कमल दल हूँ मैं,

षोडश मातृ, वर्णमाला |

मदन, इंद्रा, अश्वनी देव हूँ,

शेषनाग हूँ फन वाला |

सप्त ऋषि, मुनि, सतचित हूँ मैं,

सदा मग्न रहने वाला |

32

प्रखर सूर्य का महातेज हूँ,

वरुण देवता जल वाला |

मैं प्रलयंकर अग्नि शिखा हूँ,

मारुत हूँ हलचल वाला |

मैं यम, रूद्र, कुबेर काल हूँ,

निशि वासर, पल छिन वाला,

मैं नवगृह, नक्षत्र, धरा हूँ,

ध्रुव आसन अविचल वाला |

Please read Part 1, Part 2, Part 3, Part 5 and Part 6 of मेरा साकी मेरा हाला

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