मेरा साकी मेरी हाला - भाग 3
Poem

मेरा साकी मेरी हाला – भाग 3

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19

मानवता की कला सृष्टि ने,

जड़ को देव बना डाला |

स्थूल साध्य के बिना किसी को,

मिली कहाँ कब मधुशाला |

लोह श्रृंखला बाँध सकी क्या,

सूक्ष्म और निर्गुण वाला |

एक से होता है अनेक ज्यूँ,

सूरा सुराही औ प्याला |

20

जाता है जब फूट कलेजे का,

कोई पक कर छाला |

टीस जलन चपको से मुझको,

सुख मिलता सबसे आला |

बह जाता मेरी आँखों से,

लोहित आंसू का नाला |

द्राक्षा में हाला बनती यह,

मध्यप है साकी बाला |

21

आँखों से सागर उमड़े है,

मन में धधक रही ज्वाला |

समऋतू का अनुभव करता हूँ,

पड़े द्वार साकी बाला |

सूरी और समय ने तोड़ी,

प्रेम प्रीती की कब माला |

व्याकुल रहे चकोर धरा पर,

शशि नभ का रहने वाला |

22

चंचल मन के दो रूपों ने,

अति ही विस्मय में डाला |

निष्फलता से प्रिय मिलान की,

हुआ मृतक तरुवर पाला |

अन्य और अलमस्त ध्यान में,

बानी विचित्र चित्रशाला |

सुमनो की है सघन वाटिका,

रंग भूमि साकी बाला |

23

पढ़कर वेद पुराण शास्त्र सब,

हुआ बुद्धि का दीवाला |

एक और है कीर्तन करता,

जय गोविन्द जय गोपाला |

दूजी और चल रहे हृदय में,

शर बल्लम बरछी भाला |

दिए हाथ गोमुख में ज्ञानी,

फेर रहा किसकी माला |

24

रंगे सियारो का होता है,

यहाँ अंत में मुख काला |

मुर्दो को जीवित करते ये,

मरता है जीने वाला |

मिली झूठ को कब आयु रे,

पड़ा सत्य से जब पाला |

सोच समझ कर चलना जग में,

अरे नहीं घरवा खाला |

25

मीठी मीठी सुन्दर सुन्दर,

मन मोहक रसना वाला |

घृणा द्वेष हिंसा असत्य का,

पूर रहा जग में जाला |

मौन शांत बैठा एकाकी,

अनजाना पीने वाला |

ऊंच नीच का भेद भस्म कर,

पिला रहा मधु का प्याला |

Please read Part 1, Part 2, Part 4, Part 5 and Part 6 of मेरा साकी मेरा हाला

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