कुछ ऐसा कहो कि…
Poem

कुछ ऐसा कहो कि…

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कुछ ऐसा कहो कि…

कुछ ऐसा कहो

कि मुस्कुराने की वजह बन जाए,

कुछ ऐसा करो

कि गम भुलाने की वजह बन जाए |

 —

राह मुश्किल है

मंज़िल भी बड़ी दूर है,

दो कदम साथ दो

कि पहुँच जाने की वजह बन जाए |

 —

हूँ मझदार में

तूफानों ने आ घेरा है,

साहिल ऐसे बनो

कि तर पाने की वजह बन जाए |

 —

रात काली है

अँधियारा भी घनघोर है,

दीप बन ऐसे जलो,

कि मन में रोशनी की वजह बन जाए |

 —

झेली है बहुत चोटे

धोखो से बहुत आहत हुए,

मलहम अब ऐसे बनो

कि भरोसे की वजह बन जाए |

 —

न उम्मीद है किसी से

न उमंग ही बची है,

मन को यूँ स्पर्श करो,

कि जी जाने की वजह बन जाए |

 —

बिसर गई सब ताने

जाने कब संगीत रूठ गया,

सुर कुछ यूँ छेड़ो

कि गुनगुनाने की वजह बन जाए |

 —

जंग से जूझती इस ज़िन्दगी में

सिर्फ हार ही नज़र आती है,

होंसला अफ़ज़ाई यूँ करो

कि जीत जाने की वजह बन जाए

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